मित्रों, कुछ दिनों से एक ऐंसे विषय पर चर्चा का विचार मन में बन रहा था
किन्तु समय अभाव के कारण विचार मन में ही उमड़-घुमड़ रहा था फिर सोचा कि
क्यूँ न आज उस पर चर्चा कर ही ली जाए ... बात दरअसल यह है कि ढेरों
कुंडलियों के अध्ययन के दौरान मेरे मन में एक ऐंसा पात्र जेहन में बिजली की
तरह कौंध रहा था जिस पर चर्चा करने से खुद को रोक पाना उचित नहीं था,
खासतौर पर ज्योतिषीय द्रष्टिकोण से तो बिलकु
ल भी उचित नहीं था !
वो पात्र कोई और नहीं है "पिता" है, क्या आप, हम, या कोई और यह सोच सकता
है कि पिता भी अपनी संतान के लिए मृत्यु का कारक बन सकता है ? ... शायद
नहीं, पर यह सच है पिता भी अपनी संतान के लिए मृत्यु का कारक बन सकता है
इसके दो उदाहरण मैं आपके समक्ष प्रस्तुत कर रहा हूँ ... पहला है रावण, जो
स्वयं ही अपने पुत्र इंद्रजीत की मृत्यु का कारक बना, तथा दूसरा उदाहरण है
ध्रतराष्ट्र का जो अपने पुत्र दुर्योधन की मृत्यु का कारक बना !
सभी के तो नहीं, पर कुछेक लोगों के जेहन में यह सवाल जरुर उठेगा कि - कैसे ?
... वो ऐंसे, पहला तो रावण, जिसने अपनी बेफितूर की जिद व हठ के कारण अपने
सांथ सांथ अपने इंद्र लोक विजेता पुत्र इंद्रजीत को भी मरवा डाला ... तो
दूसरी ओर ध्रतराष्ट्र, जिसने पुत्र मोह व उसकी झूठी लालसाओं की पूर्ति के
लिए मौन धारण कर लिया तथा राजा होते हुए भी कठोर निर्णय नहीं लिए,
परिणामस्वरूप दुर्योधन का वध हुआ !
हू-ब-हू ... ठीक ऐंसे उदाहरणों
पर चर्चा नहीं कर रहा हूँ पर मैं आज "पिता" रूपी पात्र पर चर्चा कर रहा हूँ
इसलिये कुछ मिलते-जुलते उदाहरण पेश किये हैं ... हाँ तो अब मूल विषय पर
आते हैं, अब तक के ज्योतिषीय अध्ययन व अनुभव पर मैंने पाया कि - ढेरों
कुंडलियों में मैंने सम्बंधित जातकों के पिता की भूमिका बेहद ही नाकारात्मक
पाई है ... नकारात्मक से मेरा तात्पर्य यह है कि पिता के निर्णय, आदेश,
निर्देश, जिद, हठ, जुबान, के फलस्वरूप उनके बच्चों का जीवन नर्क जैसा हो
गया, या उन्हें वह सफलता व प्रसिद्धि नहीं मिली जिसके वे योग्य थे !
अब यह सवाल उठना भी जायज है कि क्या यह संभव है ? ... जी हाँ, बिलकुल संभव
है, समाज में ऐंसे ढेरों उदाहरण स्वयं आपको मिल जायेंगे, जिनमें पुत्र
अथवा पुत्री ने अपने पिता की जुबान, जिद, हठ, आदेश, निर्देश व निर्णयों के
फलस्वरूप अपना जीवन नारकीय ढंग से व्यतीत किया है, व्यतीत कर रहे हैं ! ...
चर्चा का उद्देश्य किसी की खिलाफत करना नहीं है वरन आज के बदलते परिवेश
में एक ऐंसे विषय पर लोगों का ध्यान केन्द्रित करना है, जिसके परिणाम
स्वरूप हम स्वयं अपने बच्चों को नारकीय जीवन की ओर ढकेलने से बच सकें !
मेरा तात्पर्य सिर्फ इतना है कि - हम सिर्फ अपने नजरिये से न सोचें वरन
बच्चों के नजरिये को भी समझने व जानने का प्रयास करें, परिणामस्वरूप उन्हें
नारकीय जीवन न जीना पड़े, तथा वे अपनी योग्यता व क्षमता के अनुसार अपने
जीवन की राह व मंजिल तय कर सकें, पा सकें ... "पिता" अपने आप में एक ऐंसा
विषय अर्थात पात्र है जिसके सन्दर्भ में कुण्डली के अध्ययन उपरांत
स्पष्टतौर पर फलादेश अर्थात टीका-टिप्पणी करने में स्वयं मुझे संकोच का
सामना करना पड़ता है, खैर !!
~ आचार्य उदय