Tuesday, July 21, 2015

भाग्य का निर्धारण

"जिस प्रकार रंग, रूप, आकार, स्वभाव, व्यवहार, बीमारियाँ, अच्छाईयाँ, बुराईयाँ, इत्यादि पूर्वजों व माता-पिता की संतानों में आ जाती हैं … ठीक उसी प्रकार माता-पिता व पूर्वजों से सतकर्म व दुष्कर्म के प्रभाव भी संतानों में आ जाते हैं,

लेकिन इसका अभिप्राय यह नहीं कि सम्पूर्ण जीवन इन प्रभावों के अनुकूल ही चलेगा, स्वयं के कर्म न सिर्फ महत्वपूर्ण हैं वरन सर्वोपरी भी हैं जो इंसान के भाग्य व भविष्य को बदल देते हैं,

अभिप्राय यह है कि इंसान अपने जप, तप व कर्मों से अपने भाग्य का निर्धारण स्वयं कर सकता है,
जय हो … !"

~ आचार्य उदय

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