"जिस प्रकार रंग, रूप, आकार, स्वभाव, व्यवहार, बीमारियाँ, अच्छाईयाँ,
बुराईयाँ, इत्यादि पूर्वजों व माता-पिता की संतानों में आ जाती हैं … ठीक
उसी प्रकार माता-पिता व पूर्वजों से सतकर्म व दुष्कर्म के प्रभाव भी
संतानों में आ जाते हैं,
लेकिन इसका अभिप्राय यह नहीं कि सम्पूर्ण जीवन इन प्रभावों के अनुकूल ही चलेगा, स्वयं के कर्म न सिर्फ महत्वपूर्ण हैं वरन सर्वोपरी भी हैं जो इंसान के भाग्य व भविष्य को बदल देते हैं,
अभिप्राय यह है कि इंसान अपने जप, तप व कर्मों से अपने भाग्य का निर्धारण स्वयं कर सकता है,
लेकिन इसका अभिप्राय यह नहीं कि सम्पूर्ण जीवन इन प्रभावों के अनुकूल ही चलेगा, स्वयं के कर्म न सिर्फ महत्वपूर्ण हैं वरन सर्वोपरी भी हैं जो इंसान के भाग्य व भविष्य को बदल देते हैं,
अभिप्राय यह है कि इंसान अपने जप, तप व कर्मों से अपने भाग्य का निर्धारण स्वयं कर सकता है,
जय हो … !"
~ आचार्य उदय
~ आचार्य उदय
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