Tuesday, July 21, 2015

'पितृदोष'

अक्सर … कभी-कभी … मैं भी … टेलीविजन व पत्र-पत्रिकाओं में विद्धानों को सुनते-पढ़ते रहता हूँ, इसी क्रम में, मैं आज 'पितृदोष' नामक ज्योतिषीय दोष पर चर्चा शुरू करता हूँ चर्चा का उद्देश्य आपको डराना या अपनी ओर आकर्षित करना नहीं है !

'राहु' से उत्पन्न होने वाले एक विकट ज्योतिषीय दोष का नाम 'पितृदोष' है, उपरोक्त विद्धान साथियों का मानना है कि - राहु का केंद्र में होना / राहु का बृहस्पति ग्रह के साथ होना / राहु का सूर्य ग्रह के साथ होना / राहु का नवम भाव में होना / राहु का द्धितीय या अष्ठम भाव में होना / बगैरह-बगैरह … 'पितृदोष' माने जाते हैं !

मित्रो, अब अगर हम उपरोक्त परिस्थितियों को सत्य मान लें तो लगभग 50 % से ज्यादा लोग 'पितृदोष' से पीड़ित … तब तो देश का हर दूसरा व्यक्ति 'पितृदोष' के उपायों में लगा रहेगा अर्थात उपरोक्त स्वयं-भू विद्धानों की माया नगरी में घूमता रहेगा … !

जहाँ तक मैंने पढ़ा-सुना है कि पूर्वजों के दुष्कर्मों अर्थात अनैतिक कर्मों के परिणाम स्वरूप 'पितृदोष' लग जाता है तथा उसका उपाय अर्थात समाधान अत्यंत आवश्यक होता है अन्यथा व्यक्ति परेशानियों से घिरा रहता है, … चलो मान लेते हैं कि 'पितृदोष' तथा उसका समाधान जरूरी है !

लेकिन … किन्तु … परन्तु … क्या स्वयं-भू विद्धानों की पूजा-पाठों, टोटकों, गंडे-ताबीजों से दुष्कर्मों का समाधान हो जायेगा ? … मैं ये नहीं कहता कि आप ये सब न करें, करें जरूर करें …

लेकिन मेरी भी एक बात मान लें, समझ लें, दुष्कर्मों के दोषों को सतकर्मों से ही दूर किया जा सकता है … हाय को दुआओं से ही काटा जा सकता है, … प्रायश्चित करें … सतकर्म करें … मंगल में ही मंगल है !
जय हो !!

~ आचार्य उदय

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