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Sunday, August 30, 2015

स्वभाव

"अक्सर … मैंने देखा व महसूस किया है कि बहुत सारे लोगों की कुंडली में "अति-महात्वाकांक्षा व घोर-जिद्दी स्वभाव रूपी" महायोग रहता है … अक्सर ऐसे लोग अति-महात्वाकांक्षा व जिद के कारण अपने काम स्वयं ही बिगाड़ लेते हैं …

अर्थात ऐश्वर्या रॉय जैसी लड़की से शादी के चक्कर में सामने खड़ी जयाप्रदा जैसी लड़की से शादी करने से इंकार कर देते हैं परिणाम यह होता है उन्हें आजीवन कुंवारा रहना पड़ जाता है …

और जो लोग अपनी जिद्दी व अति-महात्वाकांक्षा रूपी स्वभाव पर नियंत्रण कर लेते हैं वे अच्छे व विशाल शिखर को भी छू लेते हैं अर्थात हेमा मालिनी जैसी ड्रीम गर्ल से भी शादी करने में सफल हो जाते हैं … 

इस चर्चा के पीछे मेरा अभिप्राय मात्र यह है कि - अपने स्वभाव को जाँचें-परखें … अन्यथा हाथ पे हाथ धरे बैठे जीवन भी गुजारना पड़ सकता है … !"

~ आचार्य उदय

Sunday, August 2, 2015

काल सर्प योग ... मरता क्या न करता !

काल सर्प योग ... उफ़ ! नाम सुनते ही ... ऐंसा प्रतीत होता है जैसे यह नाम किसी भूकंप, भूचाल, तूफ़ान, सुनामी, बवंडर, इत्यादि का कोई पर्यायवाची नाम हो ! ... अब क्या कहूँ, भले यह नाम पर्यायवाची नाम नहीं है परन्तु यह नाम " कालसर्प योग" ज्योतिष में अपने आप में इनमें से किसी नाम से कम भी नहीं है ! यहाँ संक्षिप्त में यह स्पष्ट कर दूँ कि राहु और केतु के बीच में शेष समस्त ग्रहों का आ जाना ज्योतिष शास्त्र में कालसर्प योग माना गया है !

ात दरअसल यह है कि - जब कभी भी माता-पिता या परिजन अपने बच्चों की कुण्डली किसी विद्धान ज्योतिषी को दिखाते हैं और जब वह विद्धान ज्योतिषी कुण्डली देखकर कुछ इस ढंग से यह बताता है कि आपके बच्चे की कुण्डली में "कालसर्प योग अर्थात कालसर्प दोष" है तो सुनते ही कुछ पल के लिए उनके पैरों के नीचे से जमीन खिसक-सी जाती है ... और जब पैरों के नीचे से जमीन खिसक-सी गई हो तब विद्धान ज्योतिष उन्हें जो उपाय बताता या सुझाता है वे उसे राजी-खुसी मानने के लिए तैयार हो जाते हैं ... व्यहवहारिक शब्दों में कहा जाये तो … "मरता क्या न करता" ?

और ज्यादा क्या कहूँ, कुछ इसी तरह ही ढेर सारे विद्धान ज्योतिषियों की दुकानें चल रही हैं, फल-फूल रही हैं ! ... सीधे शब्दों में कहा जाए तो, यह भी "भय और भ्रम" का एक अदभुत ज्योतिषीय नजारा है ! मेरे व्यक्तिगत नजरिये से इस "योग अर्थात दोष" का कहीं कोई भयाभय सिर-पैर नहीं है ... वो इसलिये कि - मुझे तो आज तक यह समझ नहीं आया कि स्वयंभू विद्धान ज्योतिषी क्यों इसे "दोष योग" की संज्ञा देते हैं, देते आ रहे हैं जबकि मुझे तो यह हर नजर से "शुभ योग" ही नजर आता है !!

मेरा अभिप्राय यह है कि यह "अशुभ योग" न होकर एक अत्यंत प्रभावकारी "शुभ योग" है, इसे देखकर न तो मैं स्वयं डरता हूँ और न ही किसी को डराने का प्रयास करता, किन्तु यहाँ मैं इतना जरुर स्पष्ट करना चाहूँगा कि - जब कुण्डली में "कालसर्प योग" हो तब काफी गहन अध्ययन के बाद ही इस योग के सन्दर्भ में फलादेश अर्थात दिशा निर्देश देने की आवश्यकता है, ताकि इस योग के प्रतिफल स्वरूप जातक अपने लक्ष्यों को सहजता से सकारात्मक ढंग से प्राप्त कर सके !!

~ आचार्य उदय

Wednesday, July 29, 2015

पिता की भूमिका ... एक ज्योतिषीय दृष्टिकोण !

मित्रों, कुछ दिनों से एक ऐंसे विषय पर चर्चा का विचार मन में बन रहा था किन्तु समय अभाव के कारण विचार मन में ही उमड़-घुमड़ रहा था फिर सोचा कि क्यूँ न आज उस पर चर्चा कर ही ली जाए ... बात दरअसल यह है कि ढेरों कुंडलियों के अध्ययन के दौरान मेरे मन में एक ऐंसा पात्र जेहन में बिजली की तरह कौंध रहा था जिस पर चर्चा करने से खुद को रोक पाना उचित नहीं था, खासतौर पर ज्योतिषीय द्रष्टिकोण से तो बिलकुल भी उचित नहीं था ! 

वो पात्र कोई और नहीं है "पिता" है, क्या आप, हम, या कोई और यह सोच सकता है कि पिता भी अपनी संतान के लिए मृत्यु का कारक बन सकता है ? ... शायद नहीं, पर यह सच है पिता भी अपनी संतान के लिए मृत्यु का कारक बन सकता है इसके दो उदाहरण मैं आपके समक्ष प्रस्तुत कर रहा हूँ ... पहला है रावण, जो स्वयं ही अपने पुत्र इंद्रजीत की मृत्यु का कारक बना, तथा दूसरा उदाहरण है ध्रतराष्ट्र का जो अपने पुत्र दुर्योधन की मृत्यु का कारक बना !

सभी के तो नहीं, पर कुछेक लोगों के जेहन में यह सवाल जरुर उठेगा कि - कैसे ? ... वो ऐंसे, पहला तो रावण, जिसने अपनी बेफितूर की जिद व हठ के कारण अपने सांथ सांथ अपने इंद्र लोक विजेता पुत्र इंद्रजीत को भी मरवा डाला ... तो दूसरी ओर ध्रतराष्ट्र, जिसने पुत्र मोह व उसकी झूठी लालसाओं की पूर्ति के लिए मौन धारण कर लिया तथा राजा होते हुए भी कठोर निर्णय नहीं लिए, परिणामस्वरूप दुर्योधन का वध हुआ !

हू-ब-हू ... ठीक ऐंसे उदाहरणों पर चर्चा नहीं कर रहा हूँ पर मैं आज "पिता" रूपी पात्र पर चर्चा कर रहा हूँ इसलिये कुछ मिलते-जुलते उदाहरण पेश किये हैं ... हाँ तो अब मूल विषय पर आते हैं, अब तक के ज्योतिषीय अध्ययन व अनुभव पर मैंने पाया कि - ढेरों कुंडलियों में मैंने सम्बंधित जातकों के पिता की भूमिका बेहद ही नाकारात्मक पाई है ... नकारात्मक से मेरा तात्पर्य यह है कि पिता के निर्णय, आदेश, निर्देश, जिद, हठ, जुबान, के फलस्वरूप उनके बच्चों का जीवन नर्क जैसा हो गया, या उन्हें वह सफलता व प्रसिद्धि नहीं मिली जिसके वे योग्य थे !

अब यह सवाल उठना भी जायज है कि क्या यह संभव है ? ... जी हाँ, बिलकुल संभव है, समाज में ऐंसे ढेरों उदाहरण स्वयं आपको मिल जायेंगे, जिनमें पुत्र अथवा पुत्री ने अपने पिता की जुबान, जिद, हठ, आदेश, निर्देश व निर्णयों के फलस्वरूप अपना जीवन नारकीय ढंग से व्यतीत किया है, व्यतीत कर रहे हैं ! ... चर्चा का उद्देश्य किसी की खिलाफत करना नहीं है वरन आज के बदलते परिवेश में एक ऐंसे विषय पर लोगों का ध्यान केन्द्रित करना है, जिसके परिणाम स्वरूप हम स्वयं अपने बच्चों को नारकीय जीवन की ओर ढकेलने से बच सकें !

मेरा तात्पर्य सिर्फ इतना है कि - हम सिर्फ अपने नजरिये से न सोचें वरन बच्चों के नजरिये को भी समझने व जानने का प्रयास करें, परिणामस्वरूप उन्हें नारकीय जीवन न जीना पड़े, तथा वे अपनी योग्यता व क्षमता के अनुसार अपने जीवन की राह व मंजिल तय कर सकें, पा सकें ... "पिता" अपने आप में एक ऐंसा विषय अर्थात पात्र है जिसके सन्दर्भ में कुण्डली के अध्ययन उपरांत स्पष्टतौर पर फलादेश अर्थात टीका-टिप्पणी करने में स्वयं मुझे संकोच का सामना करना पड़ता है, खैर !!

~ आचार्य उदय

मंगल दोष ... या भय व भ्रम का मायाजाल ?

अक्सर हम ऐंसा सुनते रहते हैं, सुनते आये हैं कि - फलां व्यक्ति की कुण्डली में मंगल दोष है, फलां व्यक्ति मांगलिक है, या फलां व्यक्ति की कुण्डली मांगलिक है ! ... ऐंसा सुनते ही तनिक देर खौफ जैसा वातावरण बन जाता है, इस खौफरुपी भय व भ्रम के वातावरण को दूर करने की भावना से ही इस विषय पर चर्चा करना उचित समझ कर चर्चा कर रहा हूँ !

ज्योतिष के क्षेत्र में मंगल का खौफ कोई साधारण खौफ नहीं है अर्थात उसके नाम से लोगों के विवाह होते होते रुक जाते हैं, मंगल लोगों के विवाह में बाधक बन कर खड़ा हो जाता है, लोगों के वैवाहिक जीवन में शंका के बादल मंडराने लगते हैं, इस खौफरुपी भय व भ्रम की वजह से कईयों पारिवारिक व सामाजिक रिश्तों में खटास पड़ जाती है !

इस तनाव अर्थात खटास की वजह कोई और नहीं होती वरन विद्धान ज्योतिषियों द्वारा मंगल के नाम से व्याप्त किया गया भय व भ्रम होता है ! ... यहाँ मैं यह भी स्पष्ट करना चाहूंगा कि - मेरे कहने का तात्पर्य यह नहीं है कि मंगल ग्रह गाय की तरह सीधा-साधा है, तो दूसरी ओर मेरा तात्पर्य यह भी नहीं है कि साँप को साँप न मानकर उससे खिलौने की तरह खेला जाए !

अब हम इस विषय पर विस्तार से चर्चा करते हैं, बात दरअसल यह है कि जब किसी भी जातक अर्थात व्यक्ति की कुण्डली बनाई जाती है तो उसमें बारह खानों का निर्माण किया जाता है, या यूँ कहें कि कुण्डली होती ही है बारह खानों अर्थात घरों की ... जब किसी जातक की कुण्डली में, बारह घरों में से 1, 4, 7, 8, 12 वें घर में मंगल की उपस्थिति होती है तो उसे मंगल दोष, या मांगलिक मान लिया जाता है !

यहाँ पर मैं आपका ध्यान केन्द्रित करना चाहूँगा कि - कुण्डली के बारह घरों में से उपरोक्त पाँच घरों में मंगल ग्रह का होना विद्धान ज्योतिषियों की नजर में मंगल दोष माना गया है ... अर्थात सीधे तौर पर कहूं तो बारह में से पाँच घरों में अर्थात लगभग चालीस प्रतिशत घर ... वाह, गजब !!

तात्पर्य यह कि - व्यवहारिक नजरिये से देखा जाए तो लगभग चालीस प्रतिशत लोग मांगलिक अर्थात कदम कदम पर मांगलिक ... अरे भाई, बारह घरों में से पाँच घर, हुए न अपने आप में चालीस प्रतिशत ! सौ में से चालीस प्रतिशत, फिर दोष किस बात का, दोष तो हम उसे कहते जब सौ में से दो, चार, या छ: लोगों में पाया जाता ! धन्य है विद्धान ज्योतिषियों की माया ... सीधे तौर पर कहूं तो यह भय और भ्रम का एक जीता जागता उदाहरण है !!

इस भय और भ्रम को दूर करने के नजरिये से मैं यह स्पष्ट करना चाहूंगा कि मंगल ग्रह कोई अजूबा ग्रह नहीं है वरन पृथ्वी, बुध, शुक्र, चन्द्र के जैसा ही ग्रह है, फर्क है तो स्वाभाविकता व प्राकृतिकता का है ! अत: प्रत्येक जातक की कुण्डली में मंगल का फलादेश करते समय उसकी स्वाभाविकता व प्राकृतिकता के आधार पर किसी भी निष्कर्ष पर पहुँचना उचित व न्यायसंगत होगा !

जब एक ही परिवार में जन्में सगे भाइयों में, या सगे भाईयों व बहनों में आपसी तालमेल नहीं बैठ पाता है तो स्वाभाविक है दो अलग अलग परिवारों में जन्में व पले-बड़े हुए लड़का व लड़की जब शादी के बंधन में बंधकर पति-पत्नी बनते हैं तो उनमें आपस में तालमेल बैठने में समय तो लगेगा ही, फिर इसके लिए सीधे तौर पर मंगल को दोषी क्यों माना जाए ?... पर हाँ, यदि कुण्डली में मंगल के गुण-दोष का सही आंकलन कर किसी निष्कर्ष पर पहुंचा जाए तो, बिगड़े हुए या बिगड़ते हुए रिश्तों को एक नई सकारात्मक दिशा जरुर दी जा सकती है !!

~ आचार्य उदय

Tuesday, July 21, 2015

ज्योतिष रूपी लाठी हाँथ में लेने में हर्ज ही क्या है ?

मित्रो, अक्सर मैंने सुना व पढ़ा है कि - ज्योतिष पाखण्ड से जियादा कुछ भी नहीं है, … हालांकि मैंने कभी इस विषय पर किसी के साथ तर्क-वितर्क करने की कोशिश नहीं की, और न ही किसी के साथ तर्क-वितर्क करने का भविष्य में कोई इरादा है ... वजह ? ... वजह कोई ख़ास नहीं है, मैं मानता हूँ कि वर्त्तमान समय में लोगों के समक्ष यदि साक्षात 'ईश्वर' भी आ जाएँ तो भी लोग उन्हें 'ईश्वर' मानने से इंकार कर दें, … या फिर उन्हें अर्थात ईश्वर को स्वयं ऐंसी किसी कसौटी पे खरा उतरना पड़े कि उसके बाद उन्हें भगवान मानने के अलावा लोगों के पास कोई और विकल्प ही न बचे !

ठीक ऐंसा की घालमाल लोगों के जेहन में ज्योतिष के प्रति भी है, सिर्फ ज्योतिष ही क्यों ! ऐंसी स्थिति तमाम जगहों पर है, ... उदाहरण के तौर पर अपने ही देश में ऐंसे तमाम मंदिर, मस्जिद, चर्च, गुरुद्वारे, मजार, नदी, वृक्ष, पहाड़, इत्यादि स्थल हैं जहाँ एक ओर तो लाखों-करोड़ों लोग श्रद्धा व विश्वास के साथ माथा टेकते हैं, तो वहीं दूसरी ओर ढेरों लोग ऐंसे भी हैं जो उनकी कटु आलोचना करने से भी पीछे नहीं हटते, और-तो-और इन पवित्र स्थलों को भी बहुत से लोग ढोंग व पाखण्ड से ज्यादा कुछ नहीं मानते !

खैर, लोगों के व्यक्तिगत विचारों, रुझानों, समर्थनों, विरोधों, इत्यादि पर चर्चा करने का मेरा मकसद नहीं है, और न ही किसी को झूठा-सच्चा सिद्ध करना मेरा मकसद है ... लोगों के अपने-अपने तर्क, कुतर्क, वितर्क हैं जिन पर हर किसी का अपना अपना अधिकार है, … इस विषय पर मेरा चर्चा करने का उद्देश्य सिर्फ इतना है कि - ज्योतिष कोई ढोंग या पाखण्ड नहीं है वरन जांचा, परखा, व प्रयोग में लाया गया व लाया जा रहा एक सटीक विज्ञान है !

ज्योतिषरूपी विज्ञान अर्थात शास्त्र भले ही हमें भविष्य की गर्त में छिपी मंजिलों पर पहुँचने के लिये नेशनल हाइवे रूपी पक्की सड़क का मार्ग प्रशस्त न करे किन्तु एक पगडंडी रूपी कच्ची गली दिखाने में जरुर सहायक है, कौन जानता है वह कच्ची गली आगे चलकर स्वत: ही नेशनल हाइवे का रूप ले ले ... मेरे कहने का अभिप्राय यह है कि जब हमें भविष्यरूपी अंधकार अथवा उजाले में प्रवेश करना ही है तो सहारे के तौर पर ज्योतिष रूपी लाठी हाँथ में लेने में हर्ज ही क्या है ???

~ आचार्य उदय

भाग्य का निर्धारण

"जिस प्रकार रंग, रूप, आकार, स्वभाव, व्यवहार, बीमारियाँ, अच्छाईयाँ, बुराईयाँ, इत्यादि पूर्वजों व माता-पिता की संतानों में आ जाती हैं … ठीक उसी प्रकार माता-पिता व पूर्वजों से सतकर्म व दुष्कर्म के प्रभाव भी संतानों में आ जाते हैं,

लेकिन इसका अभिप्राय यह नहीं कि सम्पूर्ण जीवन इन प्रभावों के अनुकूल ही चलेगा, स्वयं के कर्म न सिर्फ महत्वपूर्ण हैं वरन सर्वोपरी भी हैं जो इंसान के भाग्य व भविष्य को बदल देते हैं,

अभिप्राय यह है कि इंसान अपने जप, तप व कर्मों से अपने भाग्य का निर्धारण स्वयं कर सकता है,
जय हो … !"

~ आचार्य उदय

'पितृदोष'

अक्सर … कभी-कभी … मैं भी … टेलीविजन व पत्र-पत्रिकाओं में विद्धानों को सुनते-पढ़ते रहता हूँ, इसी क्रम में, मैं आज 'पितृदोष' नामक ज्योतिषीय दोष पर चर्चा शुरू करता हूँ चर्चा का उद्देश्य आपको डराना या अपनी ओर आकर्षित करना नहीं है !

'राहु' से उत्पन्न होने वाले एक विकट ज्योतिषीय दोष का नाम 'पितृदोष' है, उपरोक्त विद्धान साथियों का मानना है कि - राहु का केंद्र में होना / राहु का बृहस्पति ग्रह के साथ होना / राहु का सूर्य ग्रह के साथ होना / राहु का नवम भाव में होना / राहु का द्धितीय या अष्ठम भाव में होना / बगैरह-बगैरह … 'पितृदोष' माने जाते हैं !

मित्रो, अब अगर हम उपरोक्त परिस्थितियों को सत्य मान लें तो लगभग 50 % से ज्यादा लोग 'पितृदोष' से पीड़ित … तब तो देश का हर दूसरा व्यक्ति 'पितृदोष' के उपायों में लगा रहेगा अर्थात उपरोक्त स्वयं-भू विद्धानों की माया नगरी में घूमता रहेगा … !

जहाँ तक मैंने पढ़ा-सुना है कि पूर्वजों के दुष्कर्मों अर्थात अनैतिक कर्मों के परिणाम स्वरूप 'पितृदोष' लग जाता है तथा उसका उपाय अर्थात समाधान अत्यंत आवश्यक होता है अन्यथा व्यक्ति परेशानियों से घिरा रहता है, … चलो मान लेते हैं कि 'पितृदोष' तथा उसका समाधान जरूरी है !

लेकिन … किन्तु … परन्तु … क्या स्वयं-भू विद्धानों की पूजा-पाठों, टोटकों, गंडे-ताबीजों से दुष्कर्मों का समाधान हो जायेगा ? … मैं ये नहीं कहता कि आप ये सब न करें, करें जरूर करें …

लेकिन मेरी भी एक बात मान लें, समझ लें, दुष्कर्मों के दोषों को सतकर्मों से ही दूर किया जा सकता है … हाय को दुआओं से ही काटा जा सकता है, … प्रायश्चित करें … सतकर्म करें … मंगल में ही मंगल है !
जय हो !!

~ आचार्य उदय