Friday, July 31, 2015

सत्य

"सत्य का मार्ग वह मार्ग है जहाँ संशय, दुविधा व भय का कोई स्थान नहीं है !"

~ आचार्य उदय

सत्य का मार्ग

"जो सत्य का मार्ग दिखाए, वही गुरु है !"

~ आचार्य उदय

प्रयास

"प्रयासों को न रोकें … इस मायावी संसार में कुछ भी असंभव नहीं है !"
~ आचार्य उदय

ज्योतिष शास्त्र

"ज्योतिष का सामान्य ज्ञान तो ज्योतिष क्षेत्र से जुड़े लगभग प्रत्येक व्यक्ति को होता है उदाहरण के तौर पर … ग्रह, ग्रहों के प्रभाव, योग, दोष, बगैरह-बगैरह … ज्योतिष में अगर कुछ महत्वपूर्ण है तो वो है कुण्डली का अध्यन अर्थात नब्जों को टटोलने की कला … अन्यथा सब व्यर्थ है !"

~ आचार्य उदय

माया

"मित्रो, यह संसार एक मायावी संसार है … इस संसार की माया अपरम्पार है … उदाहरण के तौर पर … जिसके पास भूख है उसके पास अन्न नहीं है और जिसके पास अन्न के भण्डार भरे पड़े हैं उसे भूख नसीब नहीं है … अर्थात जिसके पास दाँत हैं उसके पास चने नहीं हैं और जिसके पास चने हैं उसके पास दाँत नहीं हैं … सब माया है …

लेकिन इसका अभिप्राय यह नहीं है कि आनंद नहीं है … चँहू ओर आनंद ही आनंद है … जो इस माया को समझ गया सो समझो वह तर गया, और जो नहीं समझा तो नहीं समझा … खैर, मेरा मानना तो यह है कि यह संसार एक पहेली जैसा है जिसने पहेली बूझ ली वह आनंद में है और जो नहीं बबूझ पाया वह भटक रहा है …

इतिहास में बहुत ही कम लोग हैं जिन्होंने समय रहते इस पहेली अर्थात माया को समझा है और उसका आनंद उठाया है … जो समझ गया उसने आनंद उठा लिया और जो नहीं समझा … खैर, फिलहाल तो आपकी, हमारी, हम सब की बारी है … मायावी संसार … माया … आनंद … जय हो !"

~ आचार्य उदय

Wednesday, July 29, 2015

पिता की भूमिका ... एक ज्योतिषीय दृष्टिकोण !

मित्रों, कुछ दिनों से एक ऐंसे विषय पर चर्चा का विचार मन में बन रहा था किन्तु समय अभाव के कारण विचार मन में ही उमड़-घुमड़ रहा था फिर सोचा कि क्यूँ न आज उस पर चर्चा कर ही ली जाए ... बात दरअसल यह है कि ढेरों कुंडलियों के अध्ययन के दौरान मेरे मन में एक ऐंसा पात्र जेहन में बिजली की तरह कौंध रहा था जिस पर चर्चा करने से खुद को रोक पाना उचित नहीं था, खासतौर पर ज्योतिषीय द्रष्टिकोण से तो बिलकुल भी उचित नहीं था ! 

वो पात्र कोई और नहीं है "पिता" है, क्या आप, हम, या कोई और यह सोच सकता है कि पिता भी अपनी संतान के लिए मृत्यु का कारक बन सकता है ? ... शायद नहीं, पर यह सच है पिता भी अपनी संतान के लिए मृत्यु का कारक बन सकता है इसके दो उदाहरण मैं आपके समक्ष प्रस्तुत कर रहा हूँ ... पहला है रावण, जो स्वयं ही अपने पुत्र इंद्रजीत की मृत्यु का कारक बना, तथा दूसरा उदाहरण है ध्रतराष्ट्र का जो अपने पुत्र दुर्योधन की मृत्यु का कारक बना !

सभी के तो नहीं, पर कुछेक लोगों के जेहन में यह सवाल जरुर उठेगा कि - कैसे ? ... वो ऐंसे, पहला तो रावण, जिसने अपनी बेफितूर की जिद व हठ के कारण अपने सांथ सांथ अपने इंद्र लोक विजेता पुत्र इंद्रजीत को भी मरवा डाला ... तो दूसरी ओर ध्रतराष्ट्र, जिसने पुत्र मोह व उसकी झूठी लालसाओं की पूर्ति के लिए मौन धारण कर लिया तथा राजा होते हुए भी कठोर निर्णय नहीं लिए, परिणामस्वरूप दुर्योधन का वध हुआ !

हू-ब-हू ... ठीक ऐंसे उदाहरणों पर चर्चा नहीं कर रहा हूँ पर मैं आज "पिता" रूपी पात्र पर चर्चा कर रहा हूँ इसलिये कुछ मिलते-जुलते उदाहरण पेश किये हैं ... हाँ तो अब मूल विषय पर आते हैं, अब तक के ज्योतिषीय अध्ययन व अनुभव पर मैंने पाया कि - ढेरों कुंडलियों में मैंने सम्बंधित जातकों के पिता की भूमिका बेहद ही नाकारात्मक पाई है ... नकारात्मक से मेरा तात्पर्य यह है कि पिता के निर्णय, आदेश, निर्देश, जिद, हठ, जुबान, के फलस्वरूप उनके बच्चों का जीवन नर्क जैसा हो गया, या उन्हें वह सफलता व प्रसिद्धि नहीं मिली जिसके वे योग्य थे !

अब यह सवाल उठना भी जायज है कि क्या यह संभव है ? ... जी हाँ, बिलकुल संभव है, समाज में ऐंसे ढेरों उदाहरण स्वयं आपको मिल जायेंगे, जिनमें पुत्र अथवा पुत्री ने अपने पिता की जुबान, जिद, हठ, आदेश, निर्देश व निर्णयों के फलस्वरूप अपना जीवन नारकीय ढंग से व्यतीत किया है, व्यतीत कर रहे हैं ! ... चर्चा का उद्देश्य किसी की खिलाफत करना नहीं है वरन आज के बदलते परिवेश में एक ऐंसे विषय पर लोगों का ध्यान केन्द्रित करना है, जिसके परिणाम स्वरूप हम स्वयं अपने बच्चों को नारकीय जीवन की ओर ढकेलने से बच सकें !

मेरा तात्पर्य सिर्फ इतना है कि - हम सिर्फ अपने नजरिये से न सोचें वरन बच्चों के नजरिये को भी समझने व जानने का प्रयास करें, परिणामस्वरूप उन्हें नारकीय जीवन न जीना पड़े, तथा वे अपनी योग्यता व क्षमता के अनुसार अपने जीवन की राह व मंजिल तय कर सकें, पा सकें ... "पिता" अपने आप में एक ऐंसा विषय अर्थात पात्र है जिसके सन्दर्भ में कुण्डली के अध्ययन उपरांत स्पष्टतौर पर फलादेश अर्थात टीका-टिप्पणी करने में स्वयं मुझे संकोच का सामना करना पड़ता है, खैर !!

~ आचार्य उदय

जरूरतें

"सेक्स, नींद, भूख ... हमारे शरीर की जरूरतें हैं, जब तक ये तृप्त नहीं हो जातीं ... ध्यान व साधना की ओर बढ़ना व्यर्थ है !"

~ आचार्य उदय

आभार नवप्रदेश ...


मानव धर्म

"आपसी प्रेम व सौहार्द्र ही मानव धर्म है ... और समर्पण की भावना उसकी आधारशिला है !"

~ आचार्य उदय

मंगल दोष ... या भय व भ्रम का मायाजाल ?

अक्सर हम ऐंसा सुनते रहते हैं, सुनते आये हैं कि - फलां व्यक्ति की कुण्डली में मंगल दोष है, फलां व्यक्ति मांगलिक है, या फलां व्यक्ति की कुण्डली मांगलिक है ! ... ऐंसा सुनते ही तनिक देर खौफ जैसा वातावरण बन जाता है, इस खौफरुपी भय व भ्रम के वातावरण को दूर करने की भावना से ही इस विषय पर चर्चा करना उचित समझ कर चर्चा कर रहा हूँ !

ज्योतिष के क्षेत्र में मंगल का खौफ कोई साधारण खौफ नहीं है अर्थात उसके नाम से लोगों के विवाह होते होते रुक जाते हैं, मंगल लोगों के विवाह में बाधक बन कर खड़ा हो जाता है, लोगों के वैवाहिक जीवन में शंका के बादल मंडराने लगते हैं, इस खौफरुपी भय व भ्रम की वजह से कईयों पारिवारिक व सामाजिक रिश्तों में खटास पड़ जाती है !

इस तनाव अर्थात खटास की वजह कोई और नहीं होती वरन विद्धान ज्योतिषियों द्वारा मंगल के नाम से व्याप्त किया गया भय व भ्रम होता है ! ... यहाँ मैं यह भी स्पष्ट करना चाहूंगा कि - मेरे कहने का तात्पर्य यह नहीं है कि मंगल ग्रह गाय की तरह सीधा-साधा है, तो दूसरी ओर मेरा तात्पर्य यह भी नहीं है कि साँप को साँप न मानकर उससे खिलौने की तरह खेला जाए !

अब हम इस विषय पर विस्तार से चर्चा करते हैं, बात दरअसल यह है कि जब किसी भी जातक अर्थात व्यक्ति की कुण्डली बनाई जाती है तो उसमें बारह खानों का निर्माण किया जाता है, या यूँ कहें कि कुण्डली होती ही है बारह खानों अर्थात घरों की ... जब किसी जातक की कुण्डली में, बारह घरों में से 1, 4, 7, 8, 12 वें घर में मंगल की उपस्थिति होती है तो उसे मंगल दोष, या मांगलिक मान लिया जाता है !

यहाँ पर मैं आपका ध्यान केन्द्रित करना चाहूँगा कि - कुण्डली के बारह घरों में से उपरोक्त पाँच घरों में मंगल ग्रह का होना विद्धान ज्योतिषियों की नजर में मंगल दोष माना गया है ... अर्थात सीधे तौर पर कहूं तो बारह में से पाँच घरों में अर्थात लगभग चालीस प्रतिशत घर ... वाह, गजब !!

तात्पर्य यह कि - व्यवहारिक नजरिये से देखा जाए तो लगभग चालीस प्रतिशत लोग मांगलिक अर्थात कदम कदम पर मांगलिक ... अरे भाई, बारह घरों में से पाँच घर, हुए न अपने आप में चालीस प्रतिशत ! सौ में से चालीस प्रतिशत, फिर दोष किस बात का, दोष तो हम उसे कहते जब सौ में से दो, चार, या छ: लोगों में पाया जाता ! धन्य है विद्धान ज्योतिषियों की माया ... सीधे तौर पर कहूं तो यह भय और भ्रम का एक जीता जागता उदाहरण है !!

इस भय और भ्रम को दूर करने के नजरिये से मैं यह स्पष्ट करना चाहूंगा कि मंगल ग्रह कोई अजूबा ग्रह नहीं है वरन पृथ्वी, बुध, शुक्र, चन्द्र के जैसा ही ग्रह है, फर्क है तो स्वाभाविकता व प्राकृतिकता का है ! अत: प्रत्येक जातक की कुण्डली में मंगल का फलादेश करते समय उसकी स्वाभाविकता व प्राकृतिकता के आधार पर किसी भी निष्कर्ष पर पहुँचना उचित व न्यायसंगत होगा !

जब एक ही परिवार में जन्में सगे भाइयों में, या सगे भाईयों व बहनों में आपसी तालमेल नहीं बैठ पाता है तो स्वाभाविक है दो अलग अलग परिवारों में जन्में व पले-बड़े हुए लड़का व लड़की जब शादी के बंधन में बंधकर पति-पत्नी बनते हैं तो उनमें आपस में तालमेल बैठने में समय तो लगेगा ही, फिर इसके लिए सीधे तौर पर मंगल को दोषी क्यों माना जाए ?... पर हाँ, यदि कुण्डली में मंगल के गुण-दोष का सही आंकलन कर किसी निष्कर्ष पर पहुंचा जाए तो, बिगड़े हुए या बिगड़ते हुए रिश्तों को एक नई सकारात्मक दिशा जरुर दी जा सकती है !!

~ आचार्य उदय

परिवर्तनशील

"इस मायावी संसार में कोई भी चीज स्थाई नहीं है …. अच्छाई, बुराई, प्रेम, नफ़रत, सुख, दुःख, … सभी परिवर्तनशील हैं … हम भी, हमारी सोच भी … !"

~ आचार्य उदय

शिक्षा

"जो शिक्षा … व्यवहारिक जीवन में बुद्धिमान, धूर्त व मूर्ख मित्रों के … बुद्धिमतापूर्ण, धूर्ततापूर्ण व मूर्खतापूर्ण आचरण व व्यवहार से मिल सकती है … वह शिक्षा किसी भी पाठशाला व गुरुकुल में मिलना लगभग असंभव है !"

~ आचार्य उदय

प्रेम

"यदि प्रेम सवालों से घिरा है, संदेहों से ग्रसित है, तो वह प्रेम नहीं है … वह भय है, भ्रम है, छल है, … प्रेम तो समर्पण है, विश्वास है, … अगर विश्वास व समर्पण नहीं है तो फिर कुछ नहीं है !"

~ आचार्य उदय

Friday, July 24, 2015

प्रेम

"जो प्रेम का आदर-सत्कार करते हैं वे जीवन भर प्रेम से लबालब रहते हैं !"
~ आचार्य उदय

धार्मिकता

"जब हम दिखावे के लिए धार्मिकता का सहारा लेते हैं तब हमारी हरकतें खुद ब खुद जोकरों सी हो जाती हैं !"

~ आचार्य उदय

सिद्धि

"प्रभु, मैं सिद्धि प्राप्त करना चाहता हूँ !
अरे, … वाह, … क्या करोगे सिद्धि प्राप्त कर ?
सम्पूर्ण जगत को जीतना चाहता हूँ !!
सुन्दर, अतिसुन्दर, तो सुनो ... जिस दिन तुम स्वयं को जीत लोगो उसी दिन यह समझ लेना की जगत को जीत लिया अर्थात सिद्धि प्राप्त कर ली !
प्रभु, कुछ समझा नहीं ?
अभिप्राय यह है कि - इस मायावी संसार में यदि कोई सबसे सरल कार्य है तो वह स्वयं को सिद्ध करना है तथा ठीक इसके विपरीत भी यदि सबसे कठिन कोई कार्य है तो वह भी स्वयं को सिद्ध करना ही है ... अर्थात स्वयं को सिद्ध कर लेना ही सिद्धि प्राप्त कर लेना है, जगत को जीत लेना है !!"

~ आचार्य उदय

आभार नवप्रदेश ...


समय व काल

"समय व काल रूपी शक्तियाँ ... उन तूफानों अर्थात चमत्कारों की तरह होती हैं ... जो एक ओर रियासतों को खँडहर में बदल देती हैं ... तो दूसरी ओर तिनके रूपी इंसान को सम्पूर्ण ब्रम्हाण्ड की सैर करा देती हैं ... !"
~ आचार्य उदय

Social


ध्यान

"हमारा मन ... हर क्षण समुद्री लहरों की भांति हिलोरें मारते रहता है उसे एक दिशा प्रदाय कर उस पर निरंतर चलते रहना ही ध्यान है !"
~ आचार्य उदय

God


Tuesday, July 21, 2015

ज्योतिष रूपी लाठी हाँथ में लेने में हर्ज ही क्या है ?

मित्रो, अक्सर मैंने सुना व पढ़ा है कि - ज्योतिष पाखण्ड से जियादा कुछ भी नहीं है, … हालांकि मैंने कभी इस विषय पर किसी के साथ तर्क-वितर्क करने की कोशिश नहीं की, और न ही किसी के साथ तर्क-वितर्क करने का भविष्य में कोई इरादा है ... वजह ? ... वजह कोई ख़ास नहीं है, मैं मानता हूँ कि वर्त्तमान समय में लोगों के समक्ष यदि साक्षात 'ईश्वर' भी आ जाएँ तो भी लोग उन्हें 'ईश्वर' मानने से इंकार कर दें, … या फिर उन्हें अर्थात ईश्वर को स्वयं ऐंसी किसी कसौटी पे खरा उतरना पड़े कि उसके बाद उन्हें भगवान मानने के अलावा लोगों के पास कोई और विकल्प ही न बचे !

ठीक ऐंसा की घालमाल लोगों के जेहन में ज्योतिष के प्रति भी है, सिर्फ ज्योतिष ही क्यों ! ऐंसी स्थिति तमाम जगहों पर है, ... उदाहरण के तौर पर अपने ही देश में ऐंसे तमाम मंदिर, मस्जिद, चर्च, गुरुद्वारे, मजार, नदी, वृक्ष, पहाड़, इत्यादि स्थल हैं जहाँ एक ओर तो लाखों-करोड़ों लोग श्रद्धा व विश्वास के साथ माथा टेकते हैं, तो वहीं दूसरी ओर ढेरों लोग ऐंसे भी हैं जो उनकी कटु आलोचना करने से भी पीछे नहीं हटते, और-तो-और इन पवित्र स्थलों को भी बहुत से लोग ढोंग व पाखण्ड से ज्यादा कुछ नहीं मानते !

खैर, लोगों के व्यक्तिगत विचारों, रुझानों, समर्थनों, विरोधों, इत्यादि पर चर्चा करने का मेरा मकसद नहीं है, और न ही किसी को झूठा-सच्चा सिद्ध करना मेरा मकसद है ... लोगों के अपने-अपने तर्क, कुतर्क, वितर्क हैं जिन पर हर किसी का अपना अपना अधिकार है, … इस विषय पर मेरा चर्चा करने का उद्देश्य सिर्फ इतना है कि - ज्योतिष कोई ढोंग या पाखण्ड नहीं है वरन जांचा, परखा, व प्रयोग में लाया गया व लाया जा रहा एक सटीक विज्ञान है !

ज्योतिषरूपी विज्ञान अर्थात शास्त्र भले ही हमें भविष्य की गर्त में छिपी मंजिलों पर पहुँचने के लिये नेशनल हाइवे रूपी पक्की सड़क का मार्ग प्रशस्त न करे किन्तु एक पगडंडी रूपी कच्ची गली दिखाने में जरुर सहायक है, कौन जानता है वह कच्ची गली आगे चलकर स्वत: ही नेशनल हाइवे का रूप ले ले ... मेरे कहने का अभिप्राय यह है कि जब हमें भविष्यरूपी अंधकार अथवा उजाले में प्रवेश करना ही है तो सहारे के तौर पर ज्योतिष रूपी लाठी हाँथ में लेने में हर्ज ही क्या है ???

~ आचार्य उदय

ऊर्जा

"प्रेम में जो ऊर्जा है वो अदभुत है … वह किसी भी लक्ष्य को भेद सकती है !"

~ आचार्य उदय

भाग्य का निर्धारण

"जिस प्रकार रंग, रूप, आकार, स्वभाव, व्यवहार, बीमारियाँ, अच्छाईयाँ, बुराईयाँ, इत्यादि पूर्वजों व माता-पिता की संतानों में आ जाती हैं … ठीक उसी प्रकार माता-पिता व पूर्वजों से सतकर्म व दुष्कर्म के प्रभाव भी संतानों में आ जाते हैं,

लेकिन इसका अभिप्राय यह नहीं कि सम्पूर्ण जीवन इन प्रभावों के अनुकूल ही चलेगा, स्वयं के कर्म न सिर्फ महत्वपूर्ण हैं वरन सर्वोपरी भी हैं जो इंसान के भाग्य व भविष्य को बदल देते हैं,

अभिप्राय यह है कि इंसान अपने जप, तप व कर्मों से अपने भाग्य का निर्धारण स्वयं कर सकता है,
जय हो … !"

~ आचार्य उदय

'पितृदोष'

अक्सर … कभी-कभी … मैं भी … टेलीविजन व पत्र-पत्रिकाओं में विद्धानों को सुनते-पढ़ते रहता हूँ, इसी क्रम में, मैं आज 'पितृदोष' नामक ज्योतिषीय दोष पर चर्चा शुरू करता हूँ चर्चा का उद्देश्य आपको डराना या अपनी ओर आकर्षित करना नहीं है !

'राहु' से उत्पन्न होने वाले एक विकट ज्योतिषीय दोष का नाम 'पितृदोष' है, उपरोक्त विद्धान साथियों का मानना है कि - राहु का केंद्र में होना / राहु का बृहस्पति ग्रह के साथ होना / राहु का सूर्य ग्रह के साथ होना / राहु का नवम भाव में होना / राहु का द्धितीय या अष्ठम भाव में होना / बगैरह-बगैरह … 'पितृदोष' माने जाते हैं !

मित्रो, अब अगर हम उपरोक्त परिस्थितियों को सत्य मान लें तो लगभग 50 % से ज्यादा लोग 'पितृदोष' से पीड़ित … तब तो देश का हर दूसरा व्यक्ति 'पितृदोष' के उपायों में लगा रहेगा अर्थात उपरोक्त स्वयं-भू विद्धानों की माया नगरी में घूमता रहेगा … !

जहाँ तक मैंने पढ़ा-सुना है कि पूर्वजों के दुष्कर्मों अर्थात अनैतिक कर्मों के परिणाम स्वरूप 'पितृदोष' लग जाता है तथा उसका उपाय अर्थात समाधान अत्यंत आवश्यक होता है अन्यथा व्यक्ति परेशानियों से घिरा रहता है, … चलो मान लेते हैं कि 'पितृदोष' तथा उसका समाधान जरूरी है !

लेकिन … किन्तु … परन्तु … क्या स्वयं-भू विद्धानों की पूजा-पाठों, टोटकों, गंडे-ताबीजों से दुष्कर्मों का समाधान हो जायेगा ? … मैं ये नहीं कहता कि आप ये सब न करें, करें जरूर करें …

लेकिन मेरी भी एक बात मान लें, समझ लें, दुष्कर्मों के दोषों को सतकर्मों से ही दूर किया जा सकता है … हाय को दुआओं से ही काटा जा सकता है, … प्रायश्चित करें … सतकर्म करें … मंगल में ही मंगल है !
जय हो !!

~ आचार्य उदय

खुशियाँ

"खुशियाँ वो नहीं होतीं जो दिखाई देती हैं … दरअसल खुशियाँ तो वो होती हैं जिन्हें हम महसूस करते हैं !"

~ आचार्य उदय 

परीक्षा

"जीवन के कठिन पलों में … न सिर्फ अपनों की परीक्षा होती है वरन हमें भी अपनों के समक्ष परीक्षा के दौर से गुजरना पड़ता है !"

~ आचार्य उदय

Friday, July 17, 2015

समय चक्र

समय चक्र …

कल या परसों की बात है मित्रो … अचानक मेरी नजर टेलीविजन पर पडी, एक विद्धान सज्जन किसी परेशान महिला को फोन पर सलाह दे रहे थे कि -

हाँ, अभी तलाक का योग है … लेकिन दिसंबर में पुन: विवाह का प्रबल योग दिखाई दे रहा है यदि आप तलाक चाहती हैं तो दे दीजिये … दिसंबर में पुन: आपका विवाह हो जाएगा … बगैरह - बगैरह …

मैं सोच में पड़ गया कि - पहले तलाक … फिर ३-४ माह बाद ही दूसरा विवाह … उफ़्फ़ !!

यदि वो महिला फेसबुक पर हैं तो मेरी उनको एक छोटी-सी सलाह है … तलाक-बलाक … व दूसरे विवाह … के चक्कर में न पड़ें … यदि सच में ऐसा योग है कुंडली में तो मेरी सलाह तो सिर्फ इतनी-सी है कि -

आप रूठकर अपने पति से दूर चली जाएँ अर्थात कुछ समय के लिए अलग हो जाएँ … दिसंबर-जनवरी तक पुन: मिलन के योग बन जाएंगे … पुन: पारिवारिक व सांसारिक जीवन में खुशहाली आ जाएंगी …

समय का चक्र आपको तलाक व पुन:विवाह के चक्करों से मुक्त कर देगा …
जय समय बाबा !

~ आचार्य उदय

सार्थकता

"हमारी अच्छी सोच की सार्थकता तब है ... जब हम ... उसे कार्यरूप में परिणित करें !"

~ आचार्य उदय

अहं

"यदि हम … अपने अहं पर इसी तरह इतराते रहे ... तो वह दिन दूर नहीं ... जब हम ... किसी छोटी-सी ठेस से ... टूट कर बिखर जाएँ … !"

~ आचार्य उदय

पूर्णता

"प्रेम की पूर्णता जिसे हम प्रेम करते हैं उसे पा लेने में नहीं है ... वरन उसे निरंतर प्रेम करते रहने में है... क्योंकि प्रेम अमिट है, नश्वर है, अमर है !"

~ आचार्य उदय

आध्यात्मिक ऊर्जा

"जब जुबान से बिना कुछ कहे, तुम मन ही मन मुझसे कुछ कहोगे और मैं समझ लूँगा कि तुमने मुझसे क्या कहा है … ठीक इसी प्रकार जब मैं तुमसे कुछ कहूँगा और तुम समझ जाओगे कि मैंने तुमसे क्या कहा है …
तो समझ जाना कि … यही आध्यात्मिक संसार है, यही मौन की भाषा है, यही मंत्र शक्ति है, यही आध्यात्मिक ऊर्जा है … !"

~ आचार्य उदय

सोच व विचारधारा

"जब तक … हम अपनी सोच व विचारधारा न बदल लें … तब तक … यह संभव नहीं है कि हम अपने व्यवहार को बदल पाएँ !"

~ आचार्य उदय

माता-पिता

"माता-पिता ... न सिर्फ हमारे प्रथम गुरु होते हैं वरन वे हमारे अंगरक्षक भी होते हैं, एक मात्र वे ही हैं इस मायावी संसार में जो अपने पुत्र-पुत्री रूपी शिष्यों के कल्याण के लिए निस्वार्थरुप से सदैव जागरुक व प्रार्थनारत रहते हैं !"

~ आचार्य उदय

दया

"क्या दया साधना है ?

जी नहीं, ... किन्तु दया के प्रतिफल साधना से भी ज्यादा प्रभावशाली व लाभप्रद होते हैं, हो सकते हैं !"

~ आचार्य उदय

दुख

"इस मायावी संसार में सबसे ज्यादा दुखी कौन है ? ... जिसे धैर्य नहीं है, जिसे संतोष नहीं है !!"

~ आचार्य उदय

जिज्ञासा व लालसा

"यदि हम यह कहें कि - हम गुरु के बगैर सब कुछ सीख सकते हैं तो यह हमारा अहंकार है,
और ठीक इसके विपरीत यदि कोई यह कहे कि - गुरु के बगैर कुछ भी सीखना संभव नहीं है तो यह उसका भ्रम व अहंकार है,
तथा यदि गुरु स्वयं यह कहे कि - गुरु ही एक मात्र माध्यम है सीखने का, तो यह उसका अहंकार है ...
अभिप्राय यह है कि - सीखने व जानने के लिए सर्वाधिक जरुरी कोई विषय-वस्तु है तो वह है जिज्ञासा व लालसा, जिसके अभाव में न तो हम कुछ सीख सकते हैं और न ही कोई गुरु कुछ सिखा सकता है !"

~ आचार्य उदय

आभार ... नवप्रदेश ...



Saturday, July 11, 2015

ईश्वर

"जिस प्रकार कभी कभी महज एक इत्तेफाक इंसान को ज़मीन से उठा कर आसमान पर बैठा देता है तो ठीक उसी प्रकार कभी कभी महज एक संयोग पैर के तले की ज़मीन खींच लेता है और इंसान को सीधे ज़मीन पर औंधे मुंह पटक देता है ...
ये घटनाएँ साधारण होतीं हैं या असाधारण यह सवाल हमारे जेहन में गूंजने लगता है, गूंजते रहता है … कभी हम निष्कर्ष पर पहुँच जाते हैं तो कभी कन्फ्यूज रह जाते हैं …
आज इस चर्चा का अभिप्राय मात्र इतना है कि - जो लोग ईश्वर के अस्तित्व के सम्बन्ध में संशय व दुविधा में हैं … उन्हें जाकर इन दोनों (उपरोक्त व्यक्तियों) से पूंछना चाहिए कि - ईश्वर है या नहीं ?"
संभवत: उनके उत्तरों से संशय दूर हो जाए !!!
~ आचार्य उदय

प्रेम

"प्रभु, आप ने कहा और हमने मान लिया कि यह मायावी संसार है, क्या प्रेम की भी कोई माया है ?
हाँ है, क्यों नहीं है … प्रेम, … प्रेम की माया … अदभुत है, विशाल है …
एक छोटा स्वरूप यह है - … प्रेम कभी दिल से शुरू होकर जिस्म पर ख़त्म होता है, तो कभी जिस्म से शुरू होकर दिल पर …
लेकिन … किन्तु … परन्तु … प्रेम तो प्रेम है जिस पर न तो पहले किसी का जोर रहा है और न ही आगे कभी रहेगा… प्रेम तो प्रेम है… !"
~ आचार्य उदय

इच्छाशक्ति

"इस मायावी संसार में ... कोई भी कार्य कठिन नहीं है ... किन्तु जब किसी कार्य की पूर्णता के पूर्व हमारी दृढ़ इच्छाशक्ति क्षीण हो जाती है तो उसे हम कठिन मान लेते हैं ... लेकिन ... अगर ... हम चाहें तो ... हमारी किताब में कठिन जैसे शब्द रहें ही न !"
~ आचार्य उदय

लापरवाही

"चूक ... चूक होना हर किसी से संभव है,
किन्तु जब हम ... उसे नजरअंदाज करने लगते हैं ... तब वह चूक ... चूक नहीं रह जाती ... लापरवाही बन जाती है,
इस सत्य से कौन इंकार कर सकता है कि लापरवाही का दण्ड किसी न किसी दिन स्वयं हमें ही भुगतना पड़ता है !"
~ आचार्य उदय

दुआएँ या बददुआएँ ?

"दुआएँ या बददुआएँ ?
सोच लो, समझ लो, मान लो… "मरी खाल की हाय से लौह भस्म हो जाय" … !
नदी के दो किनारों की तरह ही दुआएँ व बददुआएँ सदैव हमारे जीवन में साथ-साथ चलती हैं … इसका निर्धारण भी स्वयं हमें ही करना है कि - क्या हमारे साथ चलें … दुआएँ या बददुआएँ !!
… सब अपने कर्मों पर निर्भर है !!!"
~ आचार्य उदय

लक्ष्य

"मनुष्य जीवन का ... कोई भी लक्ष्य अंतिम लक्ष्य नहीं है ... क्योंकि हर एक लक्ष्य की पूर्णता में ... एक नवीन लक्ष्य की रूपरेखा छिपी होती है ... ज्यों ही हम एक लक्ष्य पर पहुंचते हैं त्यों ही दूसरे नवीन लक्ष्य के मार्ग में प्रवेश कर लेते हैं ... यही प्रकृति है, यही प्रकृति का सच है !"
~ आचार्य उदय

Thursday, July 2, 2015

कर्म ही धर्म है !

"धर्म का सीधा सम्बन्ध कर्म से है … यदि हमारे कर्मों में लालच, छल व अत्याचार के भाव समाहित नहीं हैं तो हमारे कर्म ही धर्म हैं !"
~ आचार्य उदय

मूर्ख

"बहुत सारे मूर्ख मिलकर ... एक विद्धान को मूर्ख बनाने में सफल जरूर हो सकते हैं किन्तु बहुत सारे विद्धान मिलकर एक मूर्ख को विद्धान बनाने में सफल हो पायें ... यह जरा कठिन है !"
~ आचार्य उदय

यौनक्रीडा

"यौनक्रीडा में कहीं गौरव का भाव समाहित है तो कहीं गौरवान्वित होने का, ... किन्तु ... गर्व का कोई स्थान नहीं है !"
~ आचार्य उदय