Saturday, December 5, 2015

सुख-दुःख

"कहीं सुख ज्यादा है … तो कहीं दुःख ज्यादा है … कहीं कहीं सुख-दुःख का सम्मिश्रण है … यही जीवन है, यही जीवन का सार है … लेकिन इन सब के पीछे … हमारे या हमारे पूर्वजों के कर्म हैं, फल हैं !"

~ आचार्य उदय

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