"अश्लीलता
वह है … जिसे हम, हमारा मन, हमारी विचारधारा अश्लील मान रही है अन्यथा
संसार की कोई भी वस्तु, तस्वीर, संस्कृति, परंपरा, हाव-भाव … अपने आप में
अश्लील नहीं है !"
"इस
मायावी संसार में ... प्रचलित किसी भी विधा, किसी भी धर्म, किसी भी
संस्कृति को नजर अंदाज करने का तात्पर्य ... स्वयं को कुछ सीखने अथवा जानने
से वंचित करना है !"