Saturday, July 11, 2015

प्रेम

"प्रभु, आप ने कहा और हमने मान लिया कि यह मायावी संसार है, क्या प्रेम की भी कोई माया है ?
हाँ है, क्यों नहीं है … प्रेम, … प्रेम की माया … अदभुत है, विशाल है …
एक छोटा स्वरूप यह है - … प्रेम कभी दिल से शुरू होकर जिस्म पर ख़त्म होता है, तो कभी जिस्म से शुरू होकर दिल पर …
लेकिन … किन्तु … परन्तु … प्रेम तो प्रेम है जिस पर न तो पहले किसी का जोर रहा है और न ही आगे कभी रहेगा… प्रेम तो प्रेम है… !"
~ आचार्य उदय

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