Sunday, August 2, 2015

विनाश काले विपरीत बुद्धि !

विनाश काले विपरीत बुद्धि ... अक्सर यह कहावत सुनते आया हूँ ... विगत दिनों यह कहावत चरितार्थ होते दिखी, हुआ दरअसल यह कि - लगभग एक माह पूर्व एक मित्र अचानक सुबह सुबह मेरे घर पर नजर आये ... बात-चीत में स्पष्ट हुआ कि वो पास में ही किसी से मिलने आये थे किन्तु मिलने के समय में कुछ विलम्ब था तो वे मेरे घर चले आये ... बैठकर चाय पीते-पीते चर्चा हुई तो उसने अपने व्यवहारिक जीवन की कठिनाइयों का जिक्र किया तो मैंने पूछा "जन्म कुण्डली" होगी तो लाकर दिखाओ ... हो सकता है मैं कुछ मदद कर सकूँ ... उसने कहा ठीक है कल सुबह लेकर आता हूँ, जाते-जाते मैंने एक कागज़ के तुकडे पर उससे उसका जन्म समय, दिनांक व् स्थान पूँछ कर नोट कर लिया !

अब आप ये सोच रहे होंगे कि इस आकस्मिक दिनचर्या का इस कहावत - "विनाश काले विपरीत बुद्धि" से क्या लेना-देना है, तो चलो चलते हैं इस कहावत की ओर ... हुआ दरअसल ये कि वो मित्र तो नहीं आये ... फिर दो-तीन दिन बाद जब मैं कम्प्यूटर पर बैठा हुआ था तब अचानक उस मित्र का ध्यान आया तो मैंने नोट किये गए उसके जन्म दिनांक, समय व स्थान के आधार पर कम्प्यूटर पर उसकी कुण्डली देखी तो मैं हतप्रभ रह गया, हतप्रभ होने की वजह उसकी कुण्डली में विराजमान एक अशुभ योग था ... अशुभ योग भी ऐंसा जो उसके व्यवहारिक जीवन में सफलताओं के मार्ग में अड़ंगा लगा रहा था अर्थात काम होते-होते बिगाड़ रहा था !

चलो अब हम मूल विषय - "विनाश काले विपरीत बुद्धि" पर पहुँच रहे हैं कुण्डली देखते देखते मैंने उस मित्र को फोन लगाया फोन स्वीच्ड ऑफ मिला, दूसरे दिन लगाया तब भी स्वीच्ड ऑफ ... इस तरह मैं आठ-दस दिन लगातार उससे फोन पर संपर्क करने का प्रयास करता रहा किन्तु हर बार स्वीच्ड ऑफ - स्वीच्ड ऑफ से प्रयास असफल ही रहा ! फोन लगाने के पीछे मेरा उद्देश्य मात्र इतना था कि मित्र होने के नाते मैं उसे दो-तीन छोटे-मोटे उपाय बता देता जिसके अमल में लाने से उसके व्यवहारिक जीवन की कठिनाईयां दूर हो जातीं, किन्तु ऐंसा हो नहीं सका !

तभी मेरे जेहन में यह कहावत - "विनाश काले विपरीत बुद्धि" बिजली की तरह कौंध पड़ी ... मेरा अभिप्राय यह है कि - संभव है उसने उक्त मोबाइल नंबर बंद करके नया नंबर ले लिया हो, अब ईश्वर ही जाने कब मुलाक़ात हो !

ओवरआल, मेरा तात्पर्य यह है कि एक तो वो मित्र अचानक मिला, चर्चा हुई, उसकी समस्या का समाधान नजर आया, किन्तु नतीजे सिफर ! खैर, अब जिस दिन मुलाक़ात होगी, चर्चा होगी तब देखेंगे ... फिलहाल तो ऐंसा प्रतीत हो रहा है कि मुश्किल घड़ी में मुश्किलों से निजात पाने का उपाय मिल सकता था किन्तु ठीक उसके पहले ही बुद्धि विपरीत हो गई … नहीं तो विनाश से अर्थात मुश्किलों से बचने का प्रयास प्रारम्भ हो जाता ... इससे जाहिर होता है कि कहावत सच ही है "विनाश काले विपरीत बुद्धि" !!

~ आचार्य उदय

अधिकार

"हमारे प्रेम पर प्रथम अधिकार उसका है जो हमें प्रेम करता है, हम जिसे या किसे प्रेम करते हैं यह अलग विषय है !"

~ आचार्य उदय

मित्रता

"जो संदेहों व स्वार्थों से परे है वही सच्ची मित्रता है !"

~ आचार्य उदय

प्रेम

"प्रेम को पा लेने में प्रेम की पूर्णता नहीं है … प्रेम की पूर्णता तो प्रेम को निभाने में है !"

~ आचार्य उदय

भोग व योग

"भोग व योग … दोनों का प्रतिफल संतुष्टि प्रदायक है ... फर्क है तो सिर्फ इतना है कि … भोग का प्रतिफल क्षणिक व व्यक्तिगत है ... तो दूसरी ओर योग का प्रतिफल व्यापक होने के साथ साथ व्यक्तिगत व सामाजिक दोनों है !"

~ आचार्य उदय

काल सर्प योग ... मरता क्या न करता !

काल सर्प योग ... उफ़ ! नाम सुनते ही ... ऐंसा प्रतीत होता है जैसे यह नाम किसी भूकंप, भूचाल, तूफ़ान, सुनामी, बवंडर, इत्यादि का कोई पर्यायवाची नाम हो ! ... अब क्या कहूँ, भले यह नाम पर्यायवाची नाम नहीं है परन्तु यह नाम " कालसर्प योग" ज्योतिष में अपने आप में इनमें से किसी नाम से कम भी नहीं है ! यहाँ संक्षिप्त में यह स्पष्ट कर दूँ कि राहु और केतु के बीच में शेष समस्त ग्रहों का आ जाना ज्योतिष शास्त्र में कालसर्प योग माना गया है !

ात दरअसल यह है कि - जब कभी भी माता-पिता या परिजन अपने बच्चों की कुण्डली किसी विद्धान ज्योतिषी को दिखाते हैं और जब वह विद्धान ज्योतिषी कुण्डली देखकर कुछ इस ढंग से यह बताता है कि आपके बच्चे की कुण्डली में "कालसर्प योग अर्थात कालसर्प दोष" है तो सुनते ही कुछ पल के लिए उनके पैरों के नीचे से जमीन खिसक-सी जाती है ... और जब पैरों के नीचे से जमीन खिसक-सी गई हो तब विद्धान ज्योतिष उन्हें जो उपाय बताता या सुझाता है वे उसे राजी-खुसी मानने के लिए तैयार हो जाते हैं ... व्यहवहारिक शब्दों में कहा जाये तो … "मरता क्या न करता" ?

और ज्यादा क्या कहूँ, कुछ इसी तरह ही ढेर सारे विद्धान ज्योतिषियों की दुकानें चल रही हैं, फल-फूल रही हैं ! ... सीधे शब्दों में कहा जाए तो, यह भी "भय और भ्रम" का एक अदभुत ज्योतिषीय नजारा है ! मेरे व्यक्तिगत नजरिये से इस "योग अर्थात दोष" का कहीं कोई भयाभय सिर-पैर नहीं है ... वो इसलिये कि - मुझे तो आज तक यह समझ नहीं आया कि स्वयंभू विद्धान ज्योतिषी क्यों इसे "दोष योग" की संज्ञा देते हैं, देते आ रहे हैं जबकि मुझे तो यह हर नजर से "शुभ योग" ही नजर आता है !!

मेरा अभिप्राय यह है कि यह "अशुभ योग" न होकर एक अत्यंत प्रभावकारी "शुभ योग" है, इसे देखकर न तो मैं स्वयं डरता हूँ और न ही किसी को डराने का प्रयास करता, किन्तु यहाँ मैं इतना जरुर स्पष्ट करना चाहूँगा कि - जब कुण्डली में "कालसर्प योग" हो तब काफी गहन अध्ययन के बाद ही इस योग के सन्दर्भ में फलादेश अर्थात दिशा निर्देश देने की आवश्यकता है, ताकि इस योग के प्रतिफल स्वरूप जातक अपने लक्ष्यों को सहजता से सकारात्मक ढंग से प्राप्त कर सके !!

~ आचार्य उदय

अश्लीलता

"अश्लीलता वह है … जिसे हम, हमारा मन, हमारी विचारधारा अश्लील मान रही है अन्यथा संसार की कोई भी वस्तु, तस्वीर, संस्कृति, परंपरा, हाव-भाव … अपने आप में अश्लील नहीं है !"

~ आचार्य उदय